1999 की गर्मियों में, जब भारत की सीमाओं पर युद्ध की लपटें उठ रही थीं, तब एक नौजवान लेफ्टिनेंट अपनी जान हथेली पर लिए हिमालय की ऊँचाईयों पर दुश्मन से दो-दो हाथ करने निकला। वो सिर्फ़ एक फौजी नहीं था — वो एक जज़्बा था, एक जुनून था, एक गर्व था। उसका नाम था — कैप्टन विक्रम बत्रा। दुश्मन उसे ‘शेरशाह’ कहता था, और अपने लोग उसे वीरता की मिसाल। लेकिन ये कहानी सिर्फ कारगिल की नहीं है। ये कहानी उस मिट्टी की भी है जिसमें वो पला-बढ़ा, जिसने उसे उस सोच से बड़ा बनाया — “या तो तिरंगा लहराकर आऊंगा, या उसमें लिपटकर।
एक आम लड़का, असाधारण सपने
विक्रम का जन्म 9 सितंबर 1974 को पालमपुर (हिमाचल) में हुआ था, लेकिन उनका पारिवारिक नाता हरियाणा से था। उनके पिताजी जी.एल. बत्रा एक स्कूल प्रिंसिपल थे और मां कमल कांत बत्रा सरकारी स्कूल में अध्यापिका। वो पांच साल के थे, जब उनके माता-पिता ने पहली बार उनकी आंखों में फौजी बनने का सपना देखा। बचपन में ही NCC से जुड़ गए, और कॉलेज के दिनों में उनके अफसर बनने का जोश हर किसी को दिखता था। दोस्तों को अक्सर कहते —
“मैं फौज में जाऊंगा, और अगर युद्ध हुआ, तो देश के लिए जान भी दूंगा।”
यह सिर्फ़ शब्द नहीं थे। आने वाला वक़्त बताने वाला था कि वो इन्हें सच में बदलने वाला है।
इंडियन आर्मी में पहला कदम
1997 में उन्होंने इंडियन मिलिट्री एकेडमी, देहरादून से पास आउट किया और 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के तौर पर भर्ती हुए। सेना में उनका आत्मविश्वास इतना था कि अफसर और जवान — सभी उन्हें “जुनूनी” कहते थे। वो हमेशा कहते थे —
“जो डर गया, समझो मर गया।”
लेकिन असली अग्निपरीक्षा तो 1999 में आने वाली थी — कारगिल युद्ध।
🔥 कारगिल की लड़ाई: जब नाम बना ‘शेरशाह’
पाकिस्तानी घुसपैठियों ने भारतीय इलाक़े में कब्जा कर लिया था। विक्रम बत्रा को आदेश मिला — प्वाइंट 5140 को दुश्मन से मुक्त करवाना है। इस मिशन में विक्रम ने असाधारण साहस दिखाया। वो कहते रहे —
“चलो ऊपर, जय माता दी बोलकर!”
गोलीबारी के बीच विक्रम ने दुश्मन की एक-एक पोस्ट तबाह की, और तिरंगा लहराया। जैसे ही रेडियो पर मिशन की सफलता की खबर दी, उन्होंने वो ऐतिहासिक लाइन बोली —
“ये दिल मांगे मोर!”
यह सिर्फ़ कोल्ड ड्रिंक का स्लोगन नहीं रहा, बल्कि कारगिल का जज़्बा बन गया। इसके बाद मिशन और भी मुश्किल हुआ — प्वाइंट 4875। यहां बर्फ की चट्टानों पर लड़ाई हो रही थी। वहां विक्रम ने देखा कि एक साथी बुरी तरह घायल है। दुश्मन लगातार गोली चला रहा था। लेकिन विक्रम बिना एक पल गंवाए आगे बढ़े — सात गोलियां लगीं, फिर भी साथी को खींचकर सुरक्षित किया। इस मिशन में ही 7 जुलाई 1999 को कैप्टन बत्रा शहीद हो गए।
🙏 आख़िरी वक़्त में भी केवल साथी की चिंता
उनके साथी मेजर अनिल ने बाद में बताया —
“विक्रम को जब गोली लगी, वो कुछ नहीं बोले… बस इशारे से कहा — मेरे आदमी को पहले ले जाओ।”
सोचिए, एक जवान जिसने अपनी जान दे दी — लेकिन अंतिम सांस तक अपने सिपाही की जान की परवाह की।
🇮🇳 परमवीर चक्र — देश की तरफ़ से सलाम
उनकी बहादुरी को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया। आज भी उनकी यूनिट के सैनिक कहते हैं —
“अगर शेरशाह न होते, तो कारगिल की तस्वीर कुछ और होती।”
🎬 फिल्म ‘शेरशाह’ — एक नई पीढ़ी की प्रेरणा
कैप्टन विक्रम बत्रा की जिंदगी पर बनी फिल्म ‘Shershaah’ ने करोड़ों दिलों को झकझोर दिया। अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा ने उनका किरदार निभाया और फिल्म की कहानी हर घर तक पहुंच गई।
🧠 कुछ अनसुनी बातें:
- पाकिस्तान की सेना उन्हें ‘शेरशाह’ नाम से जानती थी। विक्रम के जुड़वां भाई विशाल बत्रा आज भी हर मंच पर उनके नाम को जीवित रखते हैं। विक्रम की मंगेतर डिंपल चीमा आज तक अविवाहित हैं — उन्होंने कहा, “मैं आज भी खुद को कैप्टन बत्रा की पत्नी मानती हूं।”
🕊️ क्यों हैं वो Heroes of Haryana?
क्योंकि वो हरियाणा के उस बेटे थे, जिसने ये सिखाया —
“देश के लिए जीना आसान है, पर मरना… सिर्फ़ शेरों का काम होता है।”
उनकी कहानी सिर्फ़ किताबों में नहीं, दिलों में रहती है। जब भी तिरंगा लहराता है, उसमें एक रंग कैप्टन बत्रा का भी होता है।
कल फिर मिलेंगे ‘Heroes of Haryana’ की अगली कहानी के साथ। FocusHaryana.in पर पढ़ते रहिए — अपने राज्य के असली नायकों की असली कहानियां।
अगर यह फॉर्मेट आपको सही लगे तो बताएं — इसे वेबसाइट पर पब्लिशिंग के लिए तैयार किया जाए? या अगला हीरो भी चुन लेते हैं?